बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कस्टम मिलिंग मामले में अनिल टुटेजा, अनवर ढेबर, अतुल सिंह और मुकेश मनचंदा को जमानत दे दी है। कस्टम मिलिंग मामले में जांच के दौरान ईओडब्ल्यू ने अनवर ढेबर और अनिल टुटेजा को आरोपी बनाते हुए केस दर्ज किया था। कोर्ट में चालान पेश होने के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। अब हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। खास बात यह है कि हाईकोर्ट की बेंच ने जांच एजेंसियों के दावों पर कड़ी टिप्पणी की है। इसमें साफ कहा गया है कि आरोपियों के अपराध में सहभागिता के साक्ष्य जांच एजेंसी पेश नहीं कर सकी है। इसके अलावा किसी मिलर द्वारा जबरन वसूली की शिकायत नहीं की गई है। इन बातों को जमानत का आधार माना गया है।
ईओडब्ल्यू के अनुसार, फरवरी 2025 में रोशन चंद्राकर और मनोज सोनी के खिलाफ पहला चालान पेश किया गया था। जांच एजेंसी का दावा है कि कस्टम मिलिंग के नाम पर राइस मिलरों से 20 रुपए प्रति क्विंटल की दर से अवैध राशि वसूली जाती थी। आरोप है कि भुगतान नहीं करने पर माकफैंड के जिला विपणन अधिकारियों के जरिए बिल रोक दिए जाते थे, जिससे दबाव बनाकर वसूली की जाती थी।
जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बेंच ने कहा कि आर्थिक अपराध होने मात्र से जमानत स्वतः अस्वीकार नहीं की जा सकती। आवेदक की किसी भी शासकीय निर्णय में किसी प्रकार की सहभागिता के कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं- ना कोई नोटशीट, ना कोई दस्तावेज, ना कहीं हस्ताक्षर वाले कोई भी दस्तावेज। इन सब कारणों से न्यायालय ने माना कि आवेदक को आगे हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है और जमानत योग्य मामला बनता है।
बयान एक जैसे- हाईकोर्ट की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि चावल मिलरों के 47 बयान एक जैसे (कॉपी-पेस्ट) पाए गए;
ये यांत्रिक व अविश्वसनीय हैं। इसके अलावा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सह-आरोपियों के बयान अकेले आधार नहीं बन सकते; सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट कानून का जिक्र किया गया। साथ ही सह-आरोपी जिन पर सीधे आरोप हैं, गिरफ्तार नहीं किए गए।
पूरक चालान पर सवाल-हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में बिना कोर्ट की अनुमति सप्लीमेंट्री चाजर्शीट दाखिल की गई; इससे आवेदक की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं की जा सकती। साथ ही वैध अभियोजन स्वीकृति के बिना ट्रायल शुरू ही नहीं हो सकता। जमानत पर सहमति देते हुए बेंच ने कहा कि सह-आरोपी रोशन चंद्राकर व मनोज सोनी को जमानत मिल चुकी है। इसी तरह आरोप मुख्यतः दस्तावेजी / डिजिटल साक्ष्य पर आधारित, जो पहले से एजेंसी के कब्जे में हैं जांच एजेंसी के फरार होने, सबूत से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका पर हाईकोर्ट ने कहा कि इसका कोई ठोस खतरा नहीं।
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