रायपुर। छत्तीसगढ़ के दक्षिणी अंचल बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक चेतना का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र दंतेवाड़ा स्थित दंतेश्वरी मंदिर। शंखिनी और डंकिनी नदियों के पवित्र संगम तट पर स्थित यह मंदिर केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि बस्तर की समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जनजातीय परंपराओं का जीवंत दस्तावेज भी है। देवी दंतेश्वरी को संपूर्ण बस्तर अंचल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है और यह मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। मान्यता है कि जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया और भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को पृथ्वी पर अलग-अलग स्थानों पर गिराया। जिस स्थान पर माता का दांत गिरा, वही स्थान आगे चलकर दंतेश्वरी कहलाया। इसी कारण दंतेवाड़ा को 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण लगभग 14वीं शताब्दी में काकतीय वंश के शासक राजा अन्नमदेव द्वारा कराया गया था। माना जाता है कि अन्नमदेव वारंगल से बस्तर आए थे और उन्होंने यहाँ काकतीय वंशी शासन की स्थापना की। देवी दंतेश्वरी उनकी आराध्य देवी थीं, इसलिए उन्होंने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। समय- समय पर बस्तर रियासत के विभिन्न शासकों द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया गया। विशेष रूप से वर्ष 1932-33 में महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी द्वारा मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण का कार्य कराया गया था। ऐसा माना जाता है कि दंतेवाड़ा का नाम भी देवी दंतेश्वरी के नाम पर ही पड़ा माना जाता है और सदियों से यह मंदिर बस्तर के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बना हुआ है।
दंतेश्वरी मंदिर भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर की संरचना में दक्षिण भारतीय और स्थानीय बस्तर शैली का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। विशाल पत्थरों से निर्मित इस मंदिर में सभा मंडप, मुख मंडप, महामंडप और गर्भगृह जैसे प्रमुख भाग हैं। मंदिर का ऊँचा शिखर दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। गर्भगृह में स्थापित देवी दंतेश्वरी की प्रतिमा काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है, जिसमें देवी को छह भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। मंदिर परिसर में नक्काशीदार स्तंभ, प्राचीन मूर्तियां और पत्थरों पर की गई कलात्मक आकृतियाँ मध्यकालीन शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं। पुरातात्विक दृष्टि से यह मंदिर बस्तर के मध्यकालीन इतिहास और काकतीय वंशी स्थापत्य शैली का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में मौजूद प्राचीन अवशेष इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।
दंतेश्वरी मंदिर का सबसे भव्य स्वरूप बस्तर दशहरा के दौरान दिखाई देता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव देश के अन्य दशहरा आयोजनों से पूरी तरह अलग और विशिष्ट है। यह पर्व देवी दंतेश्वरी को समर्पित होता है और इसमें बस्तर के विभिन्न जनजातीय समुदाय पारंपरिक वेशभूषा और लोक वाद्यों के साथ भाग लेते हैं। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का विराट उत्सव है। नवरात्रि और फागुन मेले के समय भी यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं और मंदिर परिसर दीपों तथा पारंपरिक सजावट से जगमगा उठता है।
शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित यह क्षेत्र घने जंगलों, पहाडिय़ों और प्राकृतिक हरियाली से घिरा हुआ है। यहाँ आने वाले पर्यटकों को आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ बस्तर की जनजातीय संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत अनुभव प्राप्त होता है। मंदिर के आसपास का वातावरण श्रद्धा और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचना काफी सुविधाजनक है। सड़क मार्ग से दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। रायपुर से इसकी दूरी लगभग 400 किलोमीटर है तथा रायपुर, जगदलपुर, बिलासपुर, दुर्ग और विशाखापट्टनम से नियमित बस सेवाएँ उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग-30 के माध्यम से सड़क यात्रा सहज और सुगम है। रेल मार्ग से दंतेवाड़ा रेलवे स्टेशन विशाखापट्टनम और जगदलपुर से जुड़ा हुआ है। किरंदुल रेलखंड भी इस क्षेत्र को रेल संपर्क प्रदान करता है। वायु मार्ग से आने वाले पर्यटकों के लिए निकटतम हवाई अड्डा जगदलपुर एयरपोर्ट है, जो लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है। वहाँ से टैक्सी और बस सेवाओं के माध्यम से दंतेवाड़ा पहुँचा जा सकता है।
दंतेश्वरी मंदिर के आसपास अनेक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी स्थित हैं, जिनमें चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान, बारसूर का प्राचीन मंदिर तथा ढोलकल का गणेश मंदिर प्रमुख हैं। यही कारण है कि दंतेवाड़ा धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ सांस्कृतिक और प्राकृतिक पर्यटन का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। आज दंतेश्वरी मंदिर केवल बस्तर की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण धरोहर बन चुका है। यहाँ की प्राचीन स्थापत्य कला, शक्तिपीठ की मान्यता, जनजातीय परंपराएँ और प्राकृतिक सौंदर्य हर आगंतुक को एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करते हैं। दंतेश्वरी मंदिर की यात्रा वास्तव में बस्तर की आत्मा, इतिहास और संस्कृति को निकट से महसूस करने की यात्रा है।
Author Profile
Latest entries
Big breakingAugust 15, 2026Independence Day: PM मोदी ने लाल किले पर फहराया तिरंगा, 80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को किया संबोधित
Big breakingAugust 15, 2026Independence Day 2026: CM विष्णुदेव साय ने प्रदेशवासियों को दी स्वतंत्रता दिवस की बधाई
Big breakingAugust 15, 2026Independence Day : पुलिस परेड ग्राउंड से CM विष्णु देव साय ने किया ध्वजारोहण, देखें LIVE…
NATIONALAugust 15, 2026Aaj Ka Panchang 15 August 2026: हरियाली तीज पर जानें शुभ मुहूर्त, राहुकाल, अमृत काल और दिशाशूल
